ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context·तीसरा अध्याय ] २५१ तीन सत्रह भागों वाले स्तोम पहले होते हैं और तीन सत्रह भागों वाले पीछे। अगर दो दो करके लिये जायँ तो चौंतीस हुये। स्तोमों में चौंतीसवां उत्तम या आखिरी है। सूर्य्य इन लोकों के बीच में अधिष्ठाता होकर तपता है। अपने इस पद के कारण वह भूत और भविष्यत् सभी चीजों में अच्छा है और उन सबसे अधिक चमकीला है। इस प्रकार विषुवान् अर्थात् इक्कीसवीं भी सब दिनों में श्रेष्ठ है। जो इस रहस्य को समझता है वह विभूषित होता है और इस लिये सबसे श्रेष्ठ होता है। (४) १९—अब स्वरसामों का कृत्य किया जाता है। यह लोक स्वरसाम हैं। इनको स्वरसाम इसलिए कहते हैं कि यजमानों ने इनके द्वारा इन लोकों को प्रसन्न किया। (स्पृण्वन्) ऻ। स्वरसाम करके वे (सूर्य्य को) इन लोकों में भाग दिलाते हैं। देवों को भय हुआ कि यह स्वरसामों के स्तोम सम होने के कारण और (अन्य स्तोमों द्वारा) सुरक्षित न होने के कारण गिर न पड़ें। उनको फिसलने से बचाने के लिए उन्होंने उनको नीचे से स्तोमों से और ऊपर से पृष्ठों से घेर दिया। इसीलिये (स्वर साम से पहले) "अभिजित्" दिन में सब स्तोम पढ़े जाते हैं और (स्वरसाम से बाद के दिन) "विश्वजित्" दिन में सब पृष्ठ पढ़े जाते हैं। सत्रह स्तोमों को स्तोमों और पृष्ठों से इसलिये घेर देते हैं कि वे ठहरे रहें और गिरने न पावें। देव डर गये कि सूर्य्य स्वर्गलोक से गिर न पड़े। इसलिए उन्होंने उसको पाँच रस्सियों से कस दिया। दिवाकीर्त्य साम ऻ'स्वरसाम' शब्द को "स्पृ" से कैसे बनाया और क्या अर्थ हुआ यह जान नहीं पड़ता।