ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextपहला अध्याय ] २९३ पिन्वन्त्यपो ( ऋ० १।६४।६ ) प्रव इन्द्राय बृहते ( ऋ० ८।८९।३ ) यह चौथे दिन का रूप हैं। श्रुधी हवमिन्द्र मा रिषण्यः स्याम ते दावने वसूनाम्। इमा हि त्वामूर्जो वर्धयंन्ति वसूयवः सिन्धवो न क्षरन्तः॥ ( ऋ० २।११।१ ) इसमें 'हव' शब्द आया है। यह चौथे दिन का रूप है। मरुन्वाँ इन्द्र वृषभो••••••(ऋ० ३।४७) सूक्त में ५ वें मंत्र के अन्तिम पद में 'हुवेम' में 'हुव' शब्द आया है। यह चौथे दिन का रूप है। यह त्रिष्टुभ् छन्द में है। इस मंत्र के प्रतिष्ठित पदों के द्वारा सवन को कायम रखता है कि यह कहीं गिर न पड़े। इमं नु मायिनं हुव (ऋ० ८।७६।१) इस मंत्र में 'हुव' आया है। यह चौथे दिन का रूप है। इनका छन्द गायत्री है। इस त्र्यह के मध्यं सवन का गायत्री ही वाहक है। जिस छन्द में निविद् होता है वही छन्द वाहक समझा जाता है। इस लिये निविद् गायत्री छन्द में होता है। नीचे के मंत्र बृहत् दिनों के वैराज पृष्ठ हैं। पिब्रासोम••••••( ७।२२।१-२ ) श्रुधी हवं••••••( ७।२२।४-५ ) चौथा दिन बृहत् दिन है। यह चौथे दिन का रूप है। ,धाय्या वही है—यद्द् वावान•••••• त्वामिद्धि हवामहे साता वाजस्य कारवः। त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्वां काष्ठास्वर्वतः॥ ( ऋ० ६।४६।१ ) यह बृहत् की योनि है, इसकी ओर लौटाता है। क्रम के अनुसार बृहत् साम दिन है। साम प्रगाथ वही है :— त्वमिन्द्र प्रतूर्तिषु ( ८।६६।५ )