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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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२९४ [ पाँचवीं पञ्चिका इसमें “अशस्तिहा जनिता” आया है। इसमें 'जात' आया है। यह चौथे दिन का रूप है। तार्क्ष्य वही है :-त्वमुषु वाजिनं देवजूतम् । (ऋ० १०।२२)(४) ५-विमद विरिफित वाला नीचे का सूक्त है :- कुह श्रुत इंद्रः कस्मिन्नद्य......( ऋ० १० । २२ ) इसमें ऋषि का नाम भी है और विरिफित भी है। यह चौथे दिन का रूप है। “युध्मस्य ते वृषभस्य स्वराज” ( ऋ० ३।४६ ) इस सूक्त में 'जनुषा' शब्द 'जा' धातु का आया है :-उरुं गभीरं जनुषाम्युग्रं ( ३।४६।४ ) । यह चौथे दिन का रूप है। छन्द त्रिष्टुभ् है। इसके द्वारा सवन को कायम रखता है कि कहीं गिर न पड़े। त्यमु वह सत्रासाहं विश्‍वासु गीर्ष्वायतम् । ( ऋ० ८।६२।७ ) यह पर्यास है। 'विश्‍वासु', 'गीर्षु', 'आयर्त' से मालूम होता है कि दिन का कृत्य बढ़ना है। यह चौथे दिन का रूप है। छन्द गायत्री है। इस त्र्यह में मध्य सवन के वाहक गायत्री छन्द हैं। जिस छन्द में निविद् होता है वही छन्द वाहक होता है। इसलिये निविद् को गायत्री छन्द में रखते हैं। वैश्वदेव शस्त्र के प्रतिपद और अनुचर यह हैं :- विश्वो देवस्य नेतुः ( ऋ० ५।५०।१ ) तत् सवितुर्वरेण्यम् ( ऋ० ३।६२।१० ) आ प विश्वदेवं सत्पतिम् । ( ऋ० ५।८२।७-९ ) यह चौथा बृहत् दिन है और चौथे दिन का रूप है। सविता का निविद् सूक्त यह है :- आ देवो यातु सविता सुरत्नः । ( ऋ० ७।४५ ) इसमें 'आ' है। यह चौथे दिन का रूप है।

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