ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context३२४ [ पाँचवीं पञ्चिका विश्वानरस्य वस्पतिं ( ऋ० ८।६८।४ ) इन्द्र इत् सोमपा एकः ( ऋ० ८।२।४ ) इन्द्र नेदीय एदि हि ( ऋ० ८।५३।५-६ ) उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते ( ऋ० १।४०।१-२ ) अग्निर्नैता त्वं सोम ऋतुभिः...... अब 'महद्वत्' सूक्त पढ़े जाते हैं अर्थात् वह जिनमें 'महद्' शब्द आया है :- शंसा महाम्...( ऋ० ३।४६ ) महश्चित् त्वम्... ऋ० १।१६६ ) पिबा सोममभि यं...( ऋ० ६।१७ ) यहाँ इन्द्रो नृवत् ( ऋ० ६।१६ ) इन सब में 'महान्' शब्द आया है और यह आठवें दिन का रूप है। यह त्रिष्टुभ् छन्द में है। इससे होता सवन को कायम रखता है और गिरने नहीं देता। "तमस्य द्यावा पृथिवी" ( ऋ० १०।११३ ) भी महद्वत् सूक्त है। क्योंकि पहले मन्त्र के दूसरे पाद में महिसानो शब्द आया है। इसका छन्द जगती हैं। इस त्र्यह् के मध्य सवन के वाहक छन्द जगती हैं। निविद् उसी छन्द में रक्खा जाता है जो वाहक होता है। इसलिये निविद् जगती छन्द में रक्खा गया है। अब मिथुन के सूक्त पढ़े जाते हैं त्रिष्टुभ् और जगती छन्दों में। पशु मिथुन हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये महद्वत् सूक्त पढ़े जाते हैं। अन्तरिक्ष महद् है। अन्तरिक्ष की प्राप्ति के लिये पाँच सूक्त पढ़े जाते हैं।