ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextचौथा अध्याय ] ३३३ धाय्या वही है— यद् वावान्...... (ऋ० १०।ऽ४।६) अभित्वा शूर नोनुम...... (ऋ० ७।३२।२२) इससे सबको योनि की ओर लौटाते हैं क्योंकि यह क्रम के अनुसार रथंतर है। सामप्रगाथ यह है :- इन्द्र त्रिधातु शरणं त्रिवरूथं स्वस्तिमत् । छर्दिर्य॑च्छ मघवद्भ्यश्च मह्यं च यावया दिद्युमेभ्यः ॥ ये गव्यता मनसा शत्रुमादभुरभिप्रघ्नन्ति धृष्णुया । अद्य स्मा नो मघवन्निन्द्र गिर्वणस्तनूपा अन्तमो भव ॥ (ऋ० ६।४६।६—१०) इसमें 'त्रि' है यह नवें दिन का रूप है। तार्क्ष्या वही है :— त्यमूर्षु वाजिनं देवजूतम् ॥ (ऋ० १०।१७८।१) सं च त्वे जग्मुर्गिर इन्द्र पूर्वी......(ऋ० ६।३४) २१—इसमें 'गत' शब्द है। यह नवें दिन का रूप है। "कदा सुवन् रथन्त्याणि ब्रह्म"......(ऋ० ६।३५) इसमें 'द्येति' है। 'द्येति' अन्त वाला है। यह नवें दिन का रूप है। आ सत्यो यातु मघवाँ ऋजीषी...(ऋ० ४।१६) इसमें 'सत्य' है। यह नवें दिन का रूप हैं। तत्त इंद्रियं परमं पराचैः (ऋ० १।१०३), इसमें 'परमं' अन्त वाला है। यह नवें दिन का रूप है। यह त्रिष्टुभ् छन्द में हैं। इस प्रतिष्ठित पद के द्वारा सवन को धारण करता है और गिरने नहीं देता। अहं भुव वसुनः पूर्व्य॑स्पतिः (ऋ० १०।४८।१) इसमें "अहं धनानि संजयामि शश्वतः" में 'जितं' अन्त वाला है। 'अन्त' नवें दिन का रूप है।