ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context३३४ [ पाँचवीं पञ्चिका यह जगती छन्द में है। इस त्र्यह के मध्य सवन का वाहक छन्द जगती है। जो छन्द वाहक होता है उसी में निविद रक्खा जाता है। इसीलिये निविद जगती छन्द में रक्खा गया है। मिथुन सूक्त पढ़े जाते हैं, त्रिष्टुभ् भी और जगती भी। पशु मिथुन हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये। पाँच सूक्त पढ़े जाते हैं। पंक्ति में पाँच पद होते हैं। यज्ञ में पाँच पद होते हैं। पशु पाँच पद वाले हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये। दो बार पाँच पाँच दस हो जाते हैं। विराट् दश वाली है। अन्न विराट् है। पशु अन्न हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये। वैश्वदेव के प्रति पद् और अनुचर क्रमशः यह हैं :— तत्सवितुर्वृणीमहे...... (ऋ० ५।८२।१) अद्या नो देव सवितः...... (ऋ० ५।८२।४) यह रथन्तर हैं। यह नवें दिन का रूप है। सविता का निविद् सूक्त यह हैं :— दोषो आगात्......( ? ) इसमें “सावित्रमंतो वैगतम्” अन्त वाला है। 'अन्त' नवें दिन का रूप है। द्यावा पृथिवी का निविद यह है। प्र वां महि चवी अभिः...( ऋ० ४।५६।५-७ ) इसमें 'शुची उप प्रशस्त' में 'शुचि' शब्द आया है। यह नवें दिन का रूप है। ऋभुओं का निविद यह हैं। इन्द्र इषे ददातु नः। (ऋ० ८।६३।३४) ते नो रत्नानि धत्तन (ऋ० १।२०।७-८)