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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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चौथा अध्याय ] ३३५ इसमें 'त्रि' शब्द आया है। यह नवें दिन का रूप है। बभ्रुरेको विषुणः सूनरो युव......( ऋ० ८।२६ ) दो पद वाले मंत्र हैं। मनुष्य दो पाया है। पशु चौपाये हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये। दो पद वाले वाले मंत्र इस लिये पढ़े जाते हैं कि यजमान की पशुओं में प्रतिष्ठा हो। वैश्व देवों का निविद् सूक्त यह है :- ये त्रिंशति त्रयस्परः......( ऋ० ८।१२ ) इसमें 'त्रि' शब्द आया है। यह नवें दिन का रूप है। यह गायत्री छन्द में हैं। इस त्र्यह के तीसरे सवन का छन्द गायत्री है। अग्नि मारुत शस्त्र का प्रतिपद् यह है :- वैश्वानरो न ऊतये......( आश्व० ८।११ ) इसमें 'अ प्रयातु परावत' में 'परावत' अन्त वाला है। 'अन्त' नवें दिन का रूप है। मरुतों का निविद् यह है : - मरुतो यस्य हि क्षये......( ऋ० १।८६ ) इसमें 'क्षेति' अन्त वाला है। 'अन्त' नवें दिन का रूप है। मानों कोई किसी स्थान पर जाकर पहुँचता है। जातवेद का मन्त्र वही है :- जातवेदसे सुनवाम सोमम्......( ऋ० १।६६ ) जातवेद का निविद् सूक्त यह है :- प्राग्नये वाचमीरय ( ऋ० १०।१८७ ) यह समानोदर्क है। यह नवें दिन का रूप है। "सनः पर्षदति द्विषः" इस पद का दो बार पाठ करता है। इस नवरात्र में बहुत से कृत्य हैं और चूक होना सम्भव है। इसलिए "सनः पर्षदति द्विषः" ( यह अग्नि हमारे शत्रुओं पर विजयी हो और