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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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पहला अध्याय ] २१ हेमन्त और शिशिर एक में सम्मिलित हैं। इतना संवत्सर हुआ। वर्ष ही प्रजापति है। जो इस रहस्य को जानता है वह प्रजापति- सम्बन्धी इन ऋचाओं द्वारा समृद्धि को प्राप्त होता है। (१) २—यज्ञ देवों के पास से भाग गया। उसको इष्टियों द्वारा उन्होंने तलाश करना चाहा। इष्टियों का इष्टित्व इस लिये है कि उन्होंने इनके द्वारा (यज्ञ को) तलाश करने की इच्छा की। ('इष्टि' 'इष्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है इच्छा करना—ले०)। उन्होंने उस (यज्ञ) को पा लिया। जो इस रहस्य को समझता है वह यज्ञ को पाकर समृद्धि को प्राप्त कर लेता है। वास्तव में 'आहूति' (दीर्घ ऊ की मात्रा) को 'आहुति' (ह्रस्व उ की मात्रा) कहते हैं क्योंकि इनके द्वारा यजमान देवतों को बुलाता है। यही 'आहु- तियों' का 'आहुतित्व' है। यह ऊतियां हैं। क्योंकि इन्हीं के द्वारा देवता यजमान के बुलाने पर आते हैं। ये जो 'ऊतियां' हैं वे मार्ग या पथ हैं जो यजमान के स्वर्ग तक पहुँचने के लिये होती हैं। ('आहुति' का अर्थ है, होम में अर्पण किया हुआ। 'आहूति' का अर्थ है बुलाया हुआ। इन दोनों शब्दों के अर्थों की समानता दिखाई गई हैं अर्थात् हवन में आहुति देना मानों देवों को बुलाना है—ले०)। प्रश्न यह है कि जब आहुति देने वाला दूसरा (अध्वर्यु) होता है तो अनुवाक्य और याज्य मंत्रों के पढ़ने वाले का नाम 'होता' क्यों है ? (उत्तर) क्योंकि वह देवताओं को यथा स्थान यह कह कर बुलाता है "अमुक को बुलाओ। अमुक को बुलाओ"। यही 'होता' का 'होतापन' है। जो इस रहस्य को समझता है उसे 'होता' कहते हैं। (२) ३—ऋत्विज लोग जिसको दीक्षा देते हैं उसको मानो फिर गर्भ में बुलाते हैं (नया जन्म देने के लिये)। उस पर जल छिड़कते