ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context२२ [ प्रथम पञ्चिका हैं। जल वीर्य है। मानो वह उसको दीक्षा देकर वीर्यवान् (सरेतस) बनाते हैं। नवनीत अर्थात् घी की नवनी को उस पर मलते हैं। देवों के लिये जो घी होता है उसे "आज्य" कहते हैं। ॐ जो मनुष्यों के लिये होता है उसे "घृत" । जो पितरों के लिये होता है उसे "आयुत" और जो गर्भस्थ जीवों के लिये उसे "नवनीत"। 'नवनी' मलने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकार वह उसी के भागधेय के द्वारा उसको समृद्ध बनाता है। अब आंखों में अंजन दिलाते हैं। क्योंकि जो अंजन है उससे आँखों का प्रकाश बढ़ता है। इस प्रकार उसको प्रकाश देकर दीक्षित करते हैं। दूर्भो के इक्कीस मुट्ठों से उसे शोधते हैं। इस प्रकार उसको शुद्ध और पवित्र करके दीक्षित करते हैं। अब वह उसे उस स्थान पर ले जाते हैं जो दीक्षित-पुरुष के लिये नियत होता है। यह दीक्षित पुरुष की योनि है। दीक्षा के स्थान में ले जाकर मानो वह उसे उसकी ही योनि में ले जाते हैं। इसलिये वह वहाँ योनि के सदृश सुरक्षित स्थान में ठहरता है और फिर चलता है। इसीलिये गर्भ योनियों में सुरक्षित रक्खे जाते हैं और वहाँ से उत्पन्न होते हैं। इसलिये दीक्षा-स्थान के बाहर अन्य स्थान पर दीक्षित पुरुष के ऊपर सूर्य्य उदय और अस्त न हो, और न वे लोग उससे वार्तालाप करें। ॐ घी के चार प्रकार बताये :—आज्य, घृत, आयुत, नवनीत :— सर्पिर्विलीनमाज्यं स्याद् घनीभूतं घृतं विदुः । ईषद्विलीनमायुतम् । पिघला घी 'आज्य' है। जमा हुआ 'घृत' है। आधा पिघला आयुत् है। मक्खन 'नवनीत', नवनी या लौनी कहलाता है। इसी से और तीन बनाये जाते हैं। नवनीतस्यपाकजन्यास्तिस्रोऽवस्थाः-पक्वम्, ईषत्पक्वम्, निःशेषपक्वम् च । द्रव्यान्तरप्रक्षेपेण सुरभिनिःशेष पक्वम् ॥