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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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पहला अध्याय ] २३ वे उसको वस्त्र से ढकते हैं। यह जो वस्त्र है वह दीक्षित पुरुष का उल्ब है (उल्ब उस झिल्ली को कहते हैं जिसमें बच्चा उत्पन्न होता है—ले०)। इस प्रकार वह उसे उल्ब से ढकते हैं। उसके ऊपर से कृष्णाजिन या काले मृग का चर्म लपेटते हैं। उल्ब के ऊपर जरायु होता है। इस प्रकार वह उसको जरायु से ढकते हैं। वह मुट्ठी बांधे होता है। क्योंकि मुट्ठी बांधे ही बच्चा गर्भ में होता है, मुट्ठी बांधे ही उत्पन्न होता है। यह जो वह मुट्ठी बांधता है, मानो अपने दोनों हाथों में यज्ञ और देवतों को ले लेता है। इसके लिये कहा जाता है कि जो पुरुष पहले दीक्षा ले लेता है उसकी मुट्ठी में यज्ञ होता है और मुट्ठी में देवता होते हैं, इसलिये उसको 'संसव'※ दोष नहीं लगता। और न उसको वह हानि उठानी पड़ती है जो उस पुरुष को जो पीछे से दीक्षा लेता है। अब वह मृग-चर्म को उतार कर स्नान करता है। इस प्रकार ही बच्चे जरायु के बाहर निकल कर उत्पन्न होते हैं। वह वस्त्र को लपेटे-लपेटे ही नहाता है। क्योंकि बच्चा 'उल्ब' के साथ ही तो उत्पन्न होता है। (३) ४—जो 'अनीजान' है अर्थात् जिसने अभी यज्ञ नहीं किया उसके लिये होता दो अनुवाक्य बोलता है। आज्य भाग अर्थात् घी के पहले भाग के लिये "त्वमग्ने सप्रथा असि"† (ऋ० ※ यदि दो या अधिक पुरुष एक ही समय में निकट स्थान में सोम यज्ञ करते हों तो गड़बड़ हो जाती है; उसे 'संसव' दोष कहते हैं। यदि कोई पुरुष दीक्षित हो जाय तो उसे 'संसव' दोष नहीं लगता। यह सायण की राय है। † त्वमग्ने सप्रथा असि जुष्टो होता वरेण्यः। त्वया यज्ञं वि तन्वते ॥ ( ऋ० ५।१३।४ )