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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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चौथा अध्याय ] ३६७ जो इस लोक में हैं खुश करता है। "इह रमध्व" से इन लोकों में सन्तान को खुश करता है। “इह धृतिः, इहस्वधृतिः” से यजमानों को प्रजा और वाणी धारण कराता है। 'अग्ने वाट् ' रथन्तर है। और 'स्वाहावाट्' बृहत् साम है। रथन्तर और बृहत् देवों के मिथुन हैं। मिथुन से मिथुन होता है और सन्तान होती है। उत्पत्ति के लिये ऐसा किया जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और पशुओं से सम्पन्न होता है। अब वे सब चलते हैं और स्नान कर के अग्नीध्र के स्थान को जाते हैं। उनमें से जो इस आहुति को जानता हो वह कहे "समन्वारभध्वम्" और यह पढ़ कर आहुति दे :- "उपसृजं धरुणं मातरं धरुणोधयन्। रायस्पोषमिषमूर्ज मस्मा सुदीधरत् स्वाहा"। जो इस रहस्य को समझ कर आहुति देता है वह अपने लिये और यजमानों के लिये धन, शक्ति, स्वास्थ्य और तेज प्राप्त कर लेता है। (३) २३-वे वहाँ से चलते हैं। और सदस् में पहुँचते हैं। ( उत्तर वेदी के दक्षिण पूर्वी कोने में एक स्थान होता है उसे सदस् कहते हैं )। जिधर को जो चाहें उधर को ही ( अर्थात् यह नियम नहीं है कि इसी दिशा में चलें )। अन्य ऋत्विज् भिन्न-भिन्न दिशाओं में चलते हैं। लेकिन उद्गाता लोग साथ चलते हैं। वे सर्पराज्ञी वाली ऋचायें पढ़ते हैं। यह ( पृथिवी ) सर्पराज्ञी है क्योंकि जितने चलने वाले हैं उन सब की रानी है। यह पृथिवी पहले अलोमिका ( रोम रहित या वृक्ष आदि रहित ) थी। उसने तब यह मंत्र देखा :-- अयं गौः पृश्निरक्रमीत् ( ऋ० १०।१८९६ ) २२