BharatKosha
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

Page 352 of 592

Read in context
Page 352

३३८ [ पाँचवीं पञ्चिका तब उसमें पृश्निवर्णा ( चित्र विचित्र रंगों ) ने प्रवेश किया। नाना रूपों में से जिस किसी की कामना की, ओषधि, वनस्पति इत्यादि सभी रूप इसमें आ गये। जो इस रहस्य को समझता है। वह नाना रूपों को अपनी कामना के अनुसार प्राप्त कर सकता है। प्रस्तोता मौन होकर ( मन से ) पढ़ता है। उद्गाता मौन होकर पढ़ता है। प्रतिहर्ता मौन होकर पढ़ता है। होता वाणी से ( जोर जोर से ) पढ़ता है। वाक् और मन देवों के मिथुन हैं। देवों के इस मिथुन से मिथुन की उन्नति होती है। देवों के मिथुन से मिथुन पैदा होता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सन्तान और पशुओं से युक्त होता है। अब होता चतुर्होत्री मन्त्रों को पढ़ता है। उद्गाता के स्तोत्र के साथ साथ पढ़ता है। चतुर्होत्री में देवों का जो यज्ञ का नाम था वह छिपा हुआ था। होता उसको प्रकट करता है। देवों का जो यज्ञ का नाम है उसे प्रकाशित करता है। उस प्रकाशित को प्रकाशित करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रकाशित हो जाता है। जिस वेदपाठी ब्राह्मण को यश न प्राप्त हो, वह वन में जावे, दर्भ घास के सिरों को बाँध ले और एक दूसरे ब्राह्मण के दक्षिण की ओर बैठ कर चतुर्होत्री के मंत्रों को ज़ोर ज़ोर से पढ़े। चतुर्होत्री में देवों का यज्ञ का नाम छिपा हुआ रहता है। चतुर्होत्री पढ़ने से वह नाम प्रकाशित हो जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रकाशित हो जाता है। (३) २४-अब उदम्बर वृक्ष की शाखा को ( जो यज्ञशाला में उद्गाता के आसन के पीछे रक्खी रहती है ) छूते हैं। यह सोचकर कि हम 'अन्न और रस' को छू रहे हैं। क्योंकि उदुम्बर वृक्ष 'अन्न और रस' है। जब देवों ने 'अन्न और रस'