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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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पांचवाँ अध्याय २६—(अग्निहोत्री अध्वर्यु से) शाम को कहता है:— “आहवनीय अग्नि में से ले।” जो कुछ दिन में अच्छा काम किया उसको पूर्व की ओर ले जाकर भयरहित स्थान में रख देता है। सबेरे कहता है, “आहवनीय अग्नि में से ले।” जो कुछ रात में अच्छा काम करता है उसको पूर्व में ले जाकर निर्भय स्थान में रख देता है। आहवनीय यज्ञ है। आहवनीय स्वर्ग लोक है। जो इस रहस्य को समझता है वह यज्ञ रूपी स्वर्ग लोक को स्वर्ग में स्थापित कर देता है। जो सब देवों वाले, सोलह कला वाले, पशुओं में प्रतिष्ठित यज्ञ को जानता है वह सब देवों वाले, सोलह कला वाले और पशुओं में प्रतिष्ठित यज्ञ के द्वारा सफल होता है। जो गाय में है वह रुद्र का है। जो बछड़े में है वह वायु का है। जो दुहा जाने को है वह अश्विनों का, जो दुहा जा चुका वह सोम का है। जो आग पर पकाने रक्खा वह वरुण का है। जो उबलता है वह पूषा का है। जो टपक रहा है वह ( ३४३ )