ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextपांचवाँ अध्याय ] ३४५ अधिक भोजन दे देवे । शान्ति के लिये । अन्न शान्ति है । और यह मंत्र बोले :— सूयवसाद् भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम । अद्धि तृणमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती ॥ ( ऋ० १।१६४।४० ) “बैठ और भगवती हो जिससे हम भी भगवन्त होवें । हे गौ, हर ऋतु में तृण खा । हमारे पास आती हुई शुद्ध जल पी ।” यह प्रायश्चित्त है । जिस अग्निहोत्री की बछड़े से युक्त गाय हिल जाय उसका क्या प्रायश्चित्त है ? यदि हिलकर दूध फैला दे तो उसे छूकर यह मंत्र जपे :— यद्य दुग्धं पृथिवीमसृपद्यदोषधीरत्यसृपद् यदापः । पयो गृहेषु पयो अघ्न्यायां पयोवत्सेषु पयो अस्तु तन् मयि ॥ “जो दूध आज जमीन पर फैल गया या ओषधि में मिल गया या जल में मिल गया वह दूध घरों में, वह गायों में, वह बछड़ों में, वह मुझ में हो ।” अब जो दूध बच रहे वह अगर काफ़ी हो तो उसकी आहुति दे दे । और अगर सब फैल गया हो तो दूसरी गाय मँगा कर दुहे और तब उसकी आहुति दें । श्रद्धा से हवन करना चाहिये । यह प्रायश्चित्त है । जो इस रहस्य को समझकर अग्नि- होत्र करता है उसको सब सामग्री मिल जाती है और उसे सभी चीज़ों की प्राप्ति हो जाती है । (२) २८—आदित्य इसका यूप है । पृथिवी वेदी है । ओषधि बर्हि हैं । वनस्पति ईं धन हैं । जल प्रोक्षणी है । दिशायें परिधि हैं, अगर अग्निहोत्री की कोई चीज़ खो जाय या वह मर जाय, या उसका कुछ नष्ट हो जाय तो यह सब उसको परलोक में