ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context'पांचवाँ अध्याय ] ३४९ हुये समझता है कि मैंने अग्निहोत्र कर लिया और जो इस देवता को आहुति से वंचित कर देता है, उसको यह देवता भी इस लोक और परलोक दोनों से निकाल देता है। इसलिए जो समझे कि इतना ही अग्निहोत्र काफी है, उसे इस देवता को भी आहुति देनी चाहिये। इसलिये कहते हैं कि शाम के अतिथि को लौटाना न चाहिये । एक बार नगरी के रहने वाले एक विद्वान् जानश्रुतेय ने मनतन्तु की सन्तान एकादशाक्ष से कहा था, "हम सन्तान से पहचानते हैं कि किसी ने समझ कर यज्ञ किया या बेसमझे।" एकादशाक्ष के इतने लड़के थे कि सारा राज्य भर जाय । जो सूर्योदय के पश्चात् हवन करता है उसके भी इतनी ही सन्तान होती है। (५) ३१—उदय होकर सूर्य्य अपनी रश्मियों को आहवनीय में मिला देता है। इसलिये जो सूर्योदय से पहले अग्निहोत्र करता है, वह उस कुमारी के समान है जो अभी उत्पन्न न हुये बच्चे को दूध पिलावे या गाय न उत्पन्न हुये बछड़े को थन दे। लेकिन जो सूर्योदय के बाद अग्निहोत्र करता है वह उस कुमारी के समान है जो उत्पन्न हुये बच्चे को दूध पिलाती है। या उस गाय के समान है जो उत्पन्न हुये बछड़े को थन देती है। इस प्रकार सूर्य्य के लिये जो अग्निहोत्र किया जाता है उसके बदले सूर्य्य अग्निहोत्री को इस लोक और परलोक दोनों में खाना देता है। सूर्योदय से पहले अग्निहोत्र करना ऐसा है जैसा उस आदमी या हाथी के सामने खाना फेंकना जो अपना कर नहीं बढ़ा रहा। लेकिन सूर्योदय के पश्चात् अग्नि- होत्र करना ऐसा है जैसे उस आदमी या हाथी के सामने खाना रखना जो अपने करों (हाथ या सूंड) को फैला रहा