ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context३५० [ पाँचवीं पञ्चिका हो। जो इस रहस्य को समझ कर सूर्य्योदय के पश्चात् अग्नि- होत्र करता है वह सूर्य्य के करों से अपने अग्निहोत्र को उठाता है और स्वर्ग लोक में रख देता है। इसलिये सूर्य्योदय पर अग्नि-होत्र करना चाहिये। उदय होने पर सूर्य्य सब चीज़ों को प्राण देता है। इस लिये उसको प्राण कहते हैं। जो इस रहस्य को समझ कर सूर्य्योदय के पश्चात् अग्निहोत्र करता है उसकी आहुतियाँ इसी प्राण (सूर्य्य) में स्थित रहती हैं। इसलिये सूर्य्योदय के पश्चात् अग्निहोत्र करना चाहिये। जो सायंकाल को सूर्यास्त पर और प्रातःकाल सूर्य्योदय पर अग्निहोत्र करता है वह सत्य बोलता है। सायंकाल की आहुति यह है :- भूर्भुवः स्वरो३मग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः। प्रातःकाल की आहुति यह है :- भूर्भुवः स्वरो सूर्य्योज्योतिर्ज्योतिः सूर्य्यः ॥ सच्चा आदमी सूर्य्योदय पर अग्निहोत्र करके सच्ची आहुति देता है। इसलिये सूर्य्योदय पर अग्निहोत्र करना चाहिये। इसके विषय में यह गाथा कही जाती है। "जो सूर्य्योदय से पहले अग्निहोत्र करते हैं वह झूठ बोलते हैं क्योंकि जो दिन की बात है वह दिन में नहीं करते। वह सूर्य्य की ज्योति का पाठ करते हैं और उनके पास उस समय ज्योति नहीं होती।" (६) ३२-प्रजापति ने चाहा कि मैं सन्तान उत्पन्न करूँ और बहुत हो जाऊँ। उसने तप तपा। उसने तप करके इन लोकों को उत्पन्न किया। पृथिवी को, अन्तरिक्ष को, द्यौ को। उन लोकों को गर्म किया। उन तपे हुओं से तीन ज्योतियां उत्पन्न हुईं। पृथिवी से अग्नि, अन्तरिक्ष से वायु और द्यौ से सूर्य्य। उन तीनों ज्योतियों को तपा और उनसे तीन वेद उत्पन्न हुये।