ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextचौथा अध्याय ] ३८३ पति है। प्रजापति यज्ञ है। इस प्रकार संवत्सर प्रजापति यज्ञ को प्राप्त होते हैं और हर दिन के कृत्य को संवत्सर प्रजापति यज्ञ में प्रतिष्ठित कर देते हैं। इन सूक्तों के बीच-बीच में 'विमद' ऋषि के विराज मंत्रों को चौथे दिन बिना 'न्यूङ्ख' के पढ़ना चाहिये। पंक्ति मंत्रों को पाँचवें दिन, परुच्छेप मंत्रों को छठे दिन। जो दिन महास्तोम के हों उनमें मैत्रावरुण इस मंत्र को पढ़े :—को अद्य नर्यो देवकामः ( ४।२५।१ ) ब्राह्मणाच्छंसी इसको :—"वने न वा यो न्यधायि चाकन्" ( १०।२९।१ ) अच्छावाक इस मंत्र को :—"आ याह्यर्वाङ् उप बंधुरेष्ठा" ( ३।४३।१ ) यह आवपन मंत्र हैं। इन्हीं 'आवपन' मंत्रों से देवों और ऋषियों ने स्वर्गलोक को जीता और इन्हीं के द्वारा यजमान स्वर्गलोक को प्राप्त करता है (३)। २०—उन अहीन सूक्तों के पहले हर दिन मैत्रावरुण इस सूक्त का पाठ करता है :— "सद्यो ह जातो वृषभः कनीनः" ( ऋ० ३।४८ ) यह सूक्त स्वर्ग से संबंध रखता है। इसी से देवों ने स्वर्ग जीता। इसी से ऋषियों ने। इसी से यजमान भी स्वर्ग जीत सकते हैं। यह विश्वामित्र का सूक्त है। क्योंकि विश्वामित्र सब का मित्र था। इसलिये जो इस रहस्य को समझता है उसके सभी मित्र हो जाते हैं अगर मैत्रावरुण इसको समझकर अहीन सूक्तों से पूर्व रोज़ इसका पाठ करता है। इसमें 'वृषभ' और पशुमत्' शब्द आये हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये।