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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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३८४ [ छठी पञ्चिका इसमें पाँच ऋचायें हैं। पंक्ति में पाँच पद होते हैं, पंक्ति अन्न हैं। अन्न की प्राप्ति के लिये। ब्राह्मणाच्छंसी प्रति दिन इस ब्रह्मासूक्त को पढ़ता है :- उदु ब्रह्माण्यैरत श्रवस्य (७।२३) इसमें 'ब्रह्मन्' शब्द आने से रूप समृद्धता प्राप्त होती है। यह स्वर्ग का सूक्त है। इससे देवों ने स्वर्ग जीता, ऋषियों ने स्वर्ग जीता और यजमान भी स्वर्ग जीत सकते हैं। यह वशिष्ठ का सूक्त है। इससे वशिष्ठ इन्द्र के प्रिय धाम को गया। और परम लोक को जीता। जो इस रहस्य को समझता है वह इन्द्र के प्रिय धाम को पाता है और परम लोक को जीतता है। इसमें छः ऋचायें हैं। छः ऋतुयें हैं। ऋतुओं की प्राप्ति के लिये। संपात सूक्तों के पीछे इनका पाठ करता है। इस प्रकार यजमान स्वर्ग लोक में जाने के लिए इस लोक में प्रतिष्ठित हो जाते हैं। अच्छावाक हर रोज़ यह सूक्त पढ़ता है :- अभि तष्टेव दीधया मनीषाम्... (ऋ० ३.३८ ) इसमें 'अभि' शब्द है। इसलिये यह इस लोक और परलोक के सिलसिले के लिये उपयुक्त है। इस सूक्त में "अभिप्रयाणि मर्मृशत् पराणि" शब्द आये हैं। इससे तात्पर्य है कि जो परलोक में आने वाले दिन हैं वह प्रिय हैं। इन्हीं को वह प्राप्त करता है। 'पर' का अर्थ है स्वर्गलोक जो इस लोक से परे हैं। "कवींऽरिच्छामि संदृशे सुमेधा" इन शब्दों से तात्पर्य है उन ऋषियों से जो गुज़र चुके। वे कवि हैं। इन्हीं के विषय में यह मंत्र है। यह विश्वामित्र का है। विश्वामित्र सब का मित्र था। जो इस रहस्य को समझता है उसके सभी मित्र हो जाते हैं!