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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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३९० [ छठी पञ्चिका महानामन पदों से आठ अक्षरों को जब जब आवश्यकता हो पूरा कर लें। इतरों की परवाह नहीं। जब आधे आधे मंत्र पढ़ें तो उन पाँच एकपदों को पढ़ें। और महानाम्नी से आठ अक्षर पूरा कर लें। जब ऋचावार बालखिल्यों को पढ़ें तो उन पाँच एकपदों को पढ़ें और महानाम्नी मंत्रों से आठ अक्षर लेकर पूरा कर लें। जब छः बालखिल्यों को पहली बार पढ़ता है तो प्राण और वाणी का विहार कर देता है। जब दूसरी बार पढ़ता है तो आँख और मन को मिला देता है। जब तीसरी बार पढ़ता है तो कानों और आत्मा को मिला देता है। इस प्रकार विहार का सब काम समाप्त हो जाता है । और बालखिल्य रूपी वज्र, तथा एक पद वाचःकूट और प्राणों का निर्माण इन सब के सम्बन्ध का कार्य्य समाप्त हो जाता है। बालखिल्य प्रगाथों को बिना विहार के (बिना दो सूक्तों को मिलाये हुये चौथी बार पढ़ता है। प्रगाथ पशु हैं। पशुओं की प्राप्ति के लिये। यहाँ बीच में एक पद नहीं मिलाना चाहिये। अगर बीच में एक पद मिलायेगा तो 'वाचः कूट' के द्वारा यजमान को पशुओं से अलग कर देगा उनको मारकर। यदि किसी होत्रक को ऐसा करते देखे तो उससे कहे कि तुम ने यजमान से पशुओं को मार कर अलग कर दिया। तुमने उसको पशुओं से वंचित कर दिया। ऐसा हो ही जाता है। इसलिये ऐसे अवसर पर एकपाद को मिलाना नहीं चाहिये। बालखिल्य के पिछले दो सूक्तों (७वां, ८वां) को पर्यास के तौर पर जोड़ता है (मानों किसी बर्तन पर ढक्कन रख दिया) इन दोनों को मिला देता है। वत्स के पुत्र सर्पि ने सुबल नामी