ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context३९६ ।[ छठी पञ्चिका है। वालखिल्यों को पद बढ़ा कर ऐसे पढ़े कि प्रगाथ बन जायें। बृहती आत्मा है और सतोबृहती पशु। बृहती पढ़ने से आत्मा बनता है और सतोबृहती पढ़ने से पशु बनते हैं। दोनों के पढ़ने से आत्मा को पशुओं से युक्त कर देता है। इसलिये पद बढ़ाकर पढ़े। पिछले दो सूक्त क्रम बदल कर पढ़े जाते हैं। यह उनका विहार है। मैत्रावरुण इस प्रकार यजमान के प्राण बनाकर उसको ब्राह्मणाच्छंसी के हवाले कर देता है। यह कहकर कि "तू उत्पन्न कर'। (२) २९-अब ब्राह्मणाच्छंसी 'सुकीर्ति' सूक्त (ऋ० १०।१३१) को पढ़ता है। सुकीर्ति देवयोनि है। इस प्रकार यज्ञ रूपी देव योनि से यजमान को उत्पन्न करता है। अब वृषाकपि सूक्त (ऋ० १०।८६) को पढ़ता है। वृषा- कपि आत्मा है। इस प्रकार यजमान के आत्मा को बनाता है। उसको वह न्यूंख के साथ पढ़ता है। न्यूंख अन्न है। इस प्रकार वह उसे उत्पन्न होने पर अन्न से युक्त करता है जैसे माँ बच्चे को दुग्धपान कराती है। यह सूक्त पंक्ति छन्द में है। पुरुष के पाँच भाग हैं—लोम, त्वचा, माँस, अस्थि, मज्जा। वह जैसे पुरुष बनता है उसी प्रकार यजमान को बनाता है। ब्राह्मणाच्छंसी उसको पैदा करके अच्छावाक को दे देता है, यह कह कर, "इसके लिये प्रतिष्ठा को बना"। (३) ३०—'एवायामरुत' सूक्त को अच्छावाक पढ़ता है, 'एव- यामरुत' प्रतिष्ठा है। इससे यजमान के लिये प्रतिष्ठा का संपादन करता है। इसको न्यूंख से पढ़ता है। न्यूंख अन्न है। इससे यजमान को अन्न युक्त करता है। इस सूक्त का छन्द