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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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पाँचवाँ अध्याय ] ३९५ का अर्थ है 'वाक्' । इस प्रकार सन्तान में वाणी को रखता है । इस प्रकार बोलने वाली सन्तान उत्पन्न होती है । कुछ लोग नाराशंस को नाभानेदिष्ठ से पहले बोलते हैं क्योंकि जबान आगे है। कुछ पीछे क्योंकि जबान पिछले भाग में है। मध्य में बोले क्योंकि वाणी मध्य में है। चूँकि वाणी नाभानेदिष्ठ के अगले भाग के निकटतम है अतः नाराशंस को नाभानेदिष्ठ के समाप्त होने से पहले पढ़ना चाहिये । होता यजमान को वीर्य के रूप में मैत्रावरुण को दे देता है। यह कहकर "तू इसका प्राण बना” । (१) २८—अब वह वालखिल्य पढ़ता है। वालखिल्य प्राण हैं। इस प्रकार वह यजमान के प्राण बनाता है। वह वालखिल्य को विहृत दशा में पढ़ता है (अर्थात् एक मन्त्र के एक भाग से मिलाकर)। क्योंकि यह प्राण मिले हुये हैं, प्राण अपान से और अपान व्यान से । पहले दो सूक्तों में पद-वार मिलाता है। दूसरे दो में आधी आधी ऋचा करके। और तीसरे दो में मंत्र-वार । पहले सूक्त में जो मिलाता है सो प्राण और वाणी को मिलाता है। दूसरे में चक्षु और मन को । तीसरे में कान और आत्मा को । कुछ लोग वालखिल्य पढ़ते हुये दो बृहती और दो सतो- बृहती को मिलाते हैं। इससे इच्छा तो पूरी हो जाती है परन्तु प्रगाथ नहीं बनते । एक पद अधिक मिला कर पढ़े तो प्रगाथ बन जाते हैं। वालखिल्य प्रगाथ हैं। इस लिये एक पद मिला कर पढ़े । बृहती आत्मा है और सतोबृहती प्राण । बृहती के पढ़ने से आत्मा बनता है और सतोबृहती से प्राण । इस प्रकार बृहती और सतोबृहती के पढ़ने से आत्मा को प्राणों से युक्त करता