ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextपाँचवाँ अध्याय २७—शिल्पसूक्तों को पढ़ते हैं। देव-शिल्प बहुत से हैं। और यह जो मानवी शिल्प है वह देव-शिल्पों की अनुकृति है। हाथी की सुनहरी झूलें और घोड़ों के रथ यह सब शिल्प हैं। जो इस रहस्य को समझता है वह शिल्प को जान सकता है। शिल्पों से आत्मा का संस्कार होता है और आत्मा छन्दोमय हो जाती है। होत्रक इनसे यजमान की आत्मा का संस्कार कर देता है। नाभानेदिष्ठ को पढ़ता है। नाभानेदिष्ठ वीर्य है। इस प्रकार वह वीर्य को सींचता है। यह अनिरुक्त पढ़ा जाता है (अर्थात् नाभानेदिष्ठ का मंत्र में नाम नहीं होता) क्योंकि वीर्य का नाम नहीं लेते। उसे गुप्त रीति से योनि में डाल देते हैं। वह वीर्य मिश्रित हो जाता है। (जब प्रजापति ने पुत्रों के साथ समागम किया) तब वह वीर्य जमीन पर गिर गया। सन्तानोत्पत्ति के लिये। (ऋ० १०।६१।६) अब नराशंस को पढ़ता है। 'नर' का अर्थ है 'प्रजा', 'शंस' ( ३९४ )