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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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३९८ [ छठी पञ्चिका धाय्या के पहले और मरुत शस्त्र के पीछे पढ़ा गया। उसने ऐसा ही किया और अब भी ऐसा ही करते हैं। (४) ३१—इस पर एक शंका होती है। बालखिल्य प्राण हैं और नाभानेदिष्ट वीर्य। वीर्य प्राणों से पहले होता है। जब विश्वजित, अतिरात्र और षडह के छठे दिन मैत्रावरुण बालखिल्य को पढ़ता है जो प्राण का रूप है तो नाभानेदिष्ट को क्यों नहीं पढ़ता जो वीर्य का रूप है ? इसी प्रकार ब्राह्मणाच्छंसी वृषा- कपि को क्यों पढ़ता है जब नाभानेदिष्ट नहीं पढ़ा जाता। वृषा- कपि आत्मा है। नाभानेदिष्ट वीर्य है। आत्मा अर्थात् शरीर से वीर्य पहले होता है। यज्ञ से ही यजमान का संस्कार करते हैं। जिस प्रकार योनि में गर्भ बनता है। वह एक ही दिन में नहीं बन जाता। एक एक अंग बनता है। जब पूरा बन जाय तभी कहते हैं कि बन गया इसी प्रकार यज्ञ के पूरी तरह से बनने पर यजमान भी बन जाता है। होता तीसरे सवन में 'एवयामरुत' पढ़ता है। यही यजमान की प्रतिष्ठा है जिसको वह अन्त में रखता है। (५) ३२—षडह के छठे दिन छन्दों का रस बहने लगा। प्रजापति डरा कि कहीं यह छन्दों का रस बाहर न निकल जाय और लोकों में फैल जाय। इसीलिये उसने दूसरे स्थान पर छन्द रखकर उसको दबा दिया। नाराशंसी से गायत्री का रस दबाया। रैभि से त्रिष्टुभ् का। पारिक्षिति से जगती का, कारव्य से अनुष्टुभ् का। इस प्रकार उसने छन्दों को फिर रसयुक्त कर दिया। जो इस रहस्य को समझता है उसका यज्ञ रसवाले छन्दों से पूरा होता है। और वह यज्ञ को रस युक्त छन्दों से पूरा करता है। अब नाराशंसी को पढ़ता है। नर का अर्थ है सन्तान और शंस का अर्थ है वाक्। इस प्रकार वह संतान में वाणी की