ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextपांचवां अध्याय ] ३९९ स्थापना करता है। जो इस रहस्य को समझता है उसकी संतान वाणीयुक्त होती है। देवों और ऋषियों ने नाराशंसी के द्वारा स्वर्ग को प्राप्त किया। जो इस रहस्य को समझता है उसको भी स्वर्ग की प्राप्ति होती है। यह प्रग्राह* की रीति से पढ़े जाते हैं जैसे वृषाकपि पढ़ा जाता है। (नाराशंसी) वृषाकपि के रूप के हैं। इसलिये भी ऐसा ही नियम है। इनके पाठ में न्यूंख नहीं होता किन्तु एक प्रकार का निनाद होता है। नाराशंसी मंत्रों का यही न्यूंख है। होता रैभी मंत्रों (अथर्व० २०।१२७।४) को पढ़ता है। देव और ऋषि शोर करते हुये (रेभंतो) स्वर्ग को गये थे। इसी प्रकार यजमान भी शोर करते हुये (रेभंतो) स्वर्ग को जाते हैं। इसको प्रग्राह की रीति से पढ़ता है। जैसे वृषाकपि। यह भी वृषाकपि के रूप के हैं। इसलिये इनके पाठ का भी वैसा ही नियम है। उनका न्यूंख नहीं होता, निनाद होता है। इनका यही न्यूंख है। अब यह पारिक्षिति (अथर्व० २०।१२७।७-१०) को पढ़ता है। अग्नि परिक्षित है (चारों ओर घूमती है)। प्रजा अग्नि के चारों ओर रहती है और अग्नि प्रजा के चारों ओर। जो इस रहस्य को समझता है, वह अग्नि की सायुज्यता, सारूपता और सालोक्यता प्राप्त करता है। पारिक्षिती मंत्रों के विषय में एक और बात है। संवत्सर परिक्षित है। संवत्सर प्रजा के चारों ओर रहता है और प्रजा संवत्सर के चारों ओर। जो इस *'प्रग्राह' एक पाठ की विधि है जिसमें दो तीन पदों के बाद ठहरना पड़ता है।