ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context४२६ [ सातवीं पञ्चिका यही इसका प्रायश्चित्त है। अब प्रश्न है कि अग्नियों पर समिधा रखते समय अग्नि- होत्री अन्वाहार्यपचन ( दक्षिणाग्नि ) को भी प्रज्वलित करे या न करे ? इस पर कुछ की राय है कि अवश्य करे । वह आत्मा प्राणों को रखता है जो अग्नियों को प्रज्वलित करता है, इनमें से दक्षिणाग्नि बहुत अच्छी तरह अन्न को देती हैं। इसलिये 'अग्नये अन्नादाय अन्नपतये स्वाहा' से उसमें एक आहुति देवे । जो इस रहस्य को समझता है वह अन्न खाने वाला और अन्नपति हो जाता है और संतान और अन्न से युक्त हो जाता है। अग्निहोत्र की इच्छा करने वाला गार्हपत्य और आहवनीय के बीच में चले । इस प्रकार उसको चलते देखकर अग्नियाँ समझती हैं कि यह हमारे में होम करेगा । जो इस प्रकार चलता है, दोनों अग्नियां उसके पाप को दूर कर देती हैं। जिसका पाप दूर हो जाता है वह स्वर्ग लोक को जाता है। ऐसा उस ब्राह्मण में लिखा है जिसको लोग उद्धृत किया करते हैं।* अब प्रश्न होता है कि जो परदेश में है वह अग्निहोत्री अपनी अग्नियों के पास कैसे समझा जाय । क्या अनुपस्थित को उपस्थित समझा जाय या वह प्रतिदिन वापिस आवे ? कुछ की राय है कि चुपचाप ( मन में अपने को उपस्थित समझ ले )। चुपचाप ही तो श्रेय की इच्छा किया करते हैं। कुछ की राय है कि वह रोज उनके पास जावे । क्योंकि जो अनुपस्थित होता है उसकी अग्नियां यजमान को अश्रद्धा से देखती हैं और भयभीत होती हैं कि कहीं यह हमको तितर-बितर न करदे । *यह कोई और ब्राह्मण ग्रन्थ प्रतीत होता है ।