ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context४४६ [ सातवीं पञ्चिका हैं जैसे जल में जल या अग्नि में अग्नि डाली जाती है। इसमें न तो अत्याचार है न यजमान को कोई हानि पहुँचती है। इस- लिये यह यजमान का भाग ब्राह्मण को देना चाहिये। कुछ ऋत्विज इसकी अग्नि में यह पढ़ कर आहुति दे- देते हैं। प्रजापते र्विभान्नाम लोकस्तस्मिंस्त्वादधामि सह यजमानेन स्वाहा। परन्तु ऐसा न करना चाहिये। यजमान भाग यजमान ही है। इसलिये जो यजमान भाग को अग्नि में छोड़ता है वह यजमान को अग्नि में छोड़ता है। (जिसको ऐसा करते देखे) उससे कहे "तूने यजमान को अग्नि में जला दिया। उसके प्राण अग्नि जला देगी और वह मर जायगा।" सदा ऐसा ही होता है। इसलिये ऐसा न करना चाहिये।(८) ऐतरेय ब्राह्मण की सातवीं पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त हुआ।