ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextपाँचवाँ अध्याय २७-सुपद्मा के लड़के विश्वतर ने श्यापर्णों को यज्ञ के अधिकार से वंचित कर दिया। उन श्यापर्णों ने यह सुना तो उसके यज्ञ में जाकर वेदी के भीतर बैठ गये। उनको देखकर विश्वन्तर ने कहा, “यह पाप कर्म करने वाले यहाँ बैठे हैं। यह दूसरे का नाम डुबोते हैं। इनको निकाल दो और वेदी के भीतर मत बैठने दो।” नौकरों ने सुन कर उनको निकाल दिया।' वे उठकर चिल्लाने लगे, “परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने जब कश्यपों के बिना यज्ञ करना आरंभ किया तो कश्यपों में से असितमृग लोगों ने भूतवीरों को (जो कश्यपों के स्थान में यज्ञ के लिये बुलाये गये थे) यज्ञ से निकाल दिया। यह असितमृग लोग वीर थे। क्या हम में भी कोई ऐसा बलवान है जो इस सोमपान को जीत ले (अर्थात् हमको यज्ञ में से वंचित न होने दे)!” ( १४७ )