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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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४५२ [ सातवीं पञ्चिका जब ऋत्विज अपने चमसों को पीने के लिये उठावें, उस समय यजमान भी अपने चमसे को उठावे। जब होता 'इडा' कहे तब यजमान भी अपने चमसे को पिये यह कहता हुआ:— "यदत्र शिष्टं रसिनः सुतस्य यदिन्द्रो अपिबच्छचीभिः। इदं तदस्य मनसा शिवेन सोमं राजानमिह भक्षयामि।" अर्थात् "जो सोम इन्द्र ने इन्द्राणियों के साथ पिया और उसमें से बच रहा उसको मैं प्रसन्नचित्त होकर पीता हूँ।" यह वनस्पति का रस प्रसन्न चित्त से पिया जाकर हितकर होता है। और उसका राष्ट्र उग्र और व्यथा-रहित होता है, जो इस प्रकार सोम का भक्षण करता है। नीचे का मंत्र पढ़कर मुँह पोंछता है:— शं नः एधि हृदेपीतः प्रण आयूंजी'वसे सोम तारीरिति। "हे सोम, तुम जो पिये गये हो हमारे हृदय के लिये कल्याणकारी होओ। हमारे जीवन को बढ़ाओ।" यदि वह मुँह न पोंछे तो सोम कहेगा कि किस नालायक ने मुझे पिया और वह उसकी आयु को कम कर देगा। और जो मुँह को पोंछ डालेगा तो उसका जीवन बढ़ेगा। नीचे के दो मंत्रों से चमसा को आशीर्वाद देता है:— आ प्यायस्व समेतु...( ऋ० १।६१।१६ ) सं ते पयांसि समु यन्तु वाजः...( ऋ० १।६१।१८ ) इसमें रूप समृद्धता है। जिसमें रूप समृद्धता होती है वही सफल होता है। (७) ३४—जब ऋत्विज त्रैत चमसों को रख दें तो यजमान भी अपने चमसे को रख दे। जब वे अपने चमसों को हिलावें तो यजमान भी हिलावे।