ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextपाँचवाँ अध्याय ] ४५३ अब नराशंस चमसे को उठावे और यह पढ़कर पियेः- "देव सोम ते मति विदं ऊमैः पितृभिर्भक्षितस्य भक्ष्यामि" "हे देव सोम, मैं तुम को पीता हूँ। तुम, जो मेरे मन को जानते हो और जिनका "ऊम" पितरों ने पिया है।" इस प्रकार यजमान नराशंस चमसे को प्रातः सवन में पीता है। दोपहर के सवन में 'ऊमैः' के स्थान में 'ऊर्वैः' कहता है और तीसरे सवन में "काव्यैः"। क्योंकि पितर लोग प्रातः काल को 'ऊम' होते हैं, दोपहर को 'ऊर्व' और शाम को 'काव्य'। इस प्रकार वह अमृत पितरों को सोम का पान कराता है। प्रियव्रत सोम पीने वाले (सोमपा) ने कहा था, "जो सोम पीता है और जिसके पितर सोम पीते हैं, उसके पितर अमर हो जाते हैं और उसका राज दृढ़ और व्यथारहित हो जाता है। प्रत्यभिमर्श (मुँह पोंछने की विधि) और आप्यायन (चमसे को पानी से धोने की विधि) समान ही हैं अर्थात् वही हैं जैसी ऊपर बयान की गईं। प्रातः सवन में उसी प्रकार कार्य्य करना चाहिये जैसे सोमरस निकालने में, मध्य सवन में भी उसी तरह और तृतीय सवन में भी उसी तरह। (तात्पर्य यह है कि जैसे असली सोमरस निकालने में क्रिया की जाती है उसी तरह राजा के लिये न्यग्रोध आदि का रस निकालने में भी वही क्रिया करनी चाहिये)। इस विधि को राम मार्गवेय ने सुषद्मान के पुत्र विश्वंतर से कहा था। इस पर राजा ने कहा, 'हे ब्राह्मण, हम तुझे एक हजार गौवें देते हैं। मेरे यज्ञ में श्यापर्ण लोग आवे"। इसी विधि का कथन कवष के पुत्र तुर ने परीक्षित के लड़के जन्मेजय से किया और इसी का पर्वत और नारद ने सहदेव के पुत्र सोमक से। फिर यह बात सहदेव सार्जय से कही गई। फिर बभ्रव दैवावृध से, फिर भीम वैदर्भ से, फिर नग्नजित