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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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दूसरा अध्याय ] ४६५ “ये जल कल्याणकारी, सब की औषध, राज के बढ़ाने वाले, राज को क़ायम रखने वाले और अमृत हैं। इन्हीं के द्वारा प्रजापति ने इन्द्र का, सोम राजा का, वरुण का, यम का और मनु का राज्याभिषेक किया था। इन्हीं जलों से मैं तेरा राज्याभिषेक करता हूँ, कि तू इस संसार में अधिराज हो। तेरी माता देवी ने तुझे लोगों के ऊपर महान् राज करने के लिये जना। तेरी भद्रा मा ने तुझे जना। देव सविता की प्रेरणा से, अश्विनों के बाहुओं से, पूषा के दोनों हाथों से, अग्नि के तेज से, इन्द्र की शक्ति से मैं तेरा अभिषेक करता हूँ कि तुझे बल, श्री, यश और अन्न आदि प्राप्त हों।” यदि पुरोहित चाहे कि राजा को अकेले ही बल आदि की प्राप्ति हो तो ‘भू’ कहे, यदि दो की ( पुत्र सहित ) तो ‘भूः- भुवः’ कहे। यदि तीन की ( पुत्र पौत्र सहित ), तो “भूर्भुवः स्वः” कहे। कुछ लोगों का कहना है कि चूंकि यह व्याहृतियाँ सब चीजों की प्राप्ति कराती हैं, इसलिये इनके उच्चारण से दूसरों के लिये ही कार्य्य होता है, अपने लिये नहीं। इसलिये यहाँ “भूर्भुवःस्वः” व्याहृतियाँ न कहनी चाहियें। केवल ‘देवस्य त्वा सवितुः’ इत्यादि बोलना चाहिये। कुछ की राय है कि व्याहृतियों को छोड़कर पढ़ने से केवल पहले जन्म के ऊपर ही अधिकार होता है, इस जन्म के लिये नहीं। सत्यकाम जाबाल का कथन है कि यदि व्याहृतियों को छोड़कर मंत्र बोला जाय और अभिषेक किया जाय तो इसी जीवन की सिद्धि होती है। उद्दालक आरुणि कहते हैं कि जो व्याहृतियों सहित अभिषेक होता है उसमें राजा विजय पाकर सभी चीज़ों की प्राप्ति कर लेता है। ३०