ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context४६६ [ आठवीं पञ्चिका इसलिये अभिषेक करते समय "देवस्य त्वा......अन्नाद्याय भूर्भुवः स्वः" ऐसा पाठ करना चाहिये । यज्ञ करने वाले क्षत्रिय से यह चीजें निकल जाती हैं :- ब्रह्मत्व जो क्षत्रिय को प्राप्त हो गया था, ऊर्ज, अन्नाद्य, जल और ओषधियों का रस, ब्रह्मवर्चस्, पुष्टि, संतति, क्षत्र रूप । क्षत्र ओषधियों की प्रतिष्ठा है। जो इन दो आहुतियों को देता है वह ब्रह्मत्व को क्षत्रत्व में स्थापित करता है । (३) ८-तख्त, चमसा और शाखा उदुम्बर की क्यों हो ? इसलिये कि उदुम्बर ऊर्ज है और उदुम्बर अन्न है। उदुम्बर की इन चीजों का प्रयोजन यह है कि ऊर्ज और अन्न धारण कराता है। दही, मधु और घी के विषय में यह बात है कि यह जलों और ओषधियों के रस हैं। इनके द्वारा वह राजा में जलों और ओषधियों का रस धारण कराता है । धूप के समय के मेंह के पानी से तेज और ब्रह्मवर्चस् का तात्पर्य है। इससे वह तेज और ब्रह्मवर्चस् को राजा में स्थापित करता है। शष्प और तोक्म ( घास ) पुष्टि और प्रजा का रूप है। इससे राजा में पुष्टि और प्रजा को स्थापित कराता है। यह जो सुरा है वह क्षत्र रूप है। और यह अन्न का रस भी है। इस प्रकार क्षत्र और अन्न का रस दोनों उसमें स्थापित किये जाते हैं। यह जो दूर्व है वह ओषधियों का राजा है। दूर्व राजा का चिह्न है, जैसे राजा अपने राज में विस्तृत होता है ऐसे ही दूर्व भी विस्तृत रहती है। जैसे दूर्व की जड़ें भली भांति पृथ्वी में प्रतिष्ठित होती हैं उसी प्रकार राजा भी राज्य में प्रतिष्ठित होता है। इस प्रकार राजा में ओषधियों का क्षत्र तथा प्रतिष्ठा स्थापित होती है।