ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextदूसरा अध्याय ] ४६७ जो चीजें यज्ञ करने के अनन्तर राजा में से निकल गई थीं वह फिर उसमें आ जाती हैं। उनके द्वारा वह इस प्रकार सफल होता है। अब वह सुरा के कंस (प्याले) को उसके हाथ में देता है, और यह मंत्र पढ़ता है :- स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोम धारया। इन्द्राय पातवे सुतः ॥ (ऋ० ६।१।१) "स्वादवाली और मद वाली सोम धारा से पवित्र कर। तू इन्द्र की रक्षा के लिये निचोड़ा गया है।" अब शांति का वचन बोलता है :- "नाना हि वां देवहितं सदस्कृतं मा संसृक्षाथां परमे व्योमनि। सुरा त्वमसि शुष्मिणी सोम एष राजा मैनं हिंसिष्टं स्वां योनिमाविशंतौ ॥ "(हे सुरा और सोम) देवों ने तुम दोनों के लिये अलग- अलग स्थान दिया है। परम आकाश में मत मिलो। सुरा तू बलवान है। सोम, तू राजा है। इसको मत मार। अपने-अपने स्थान को जा।" सोम पान और सुरापान में भिन्नता है। पीकर यह सोचे कि यह (प्याले का देने वाला ऋत्विज्) मेरा मित्र है और जो सुरा बच रहे वह उसको दे। इस प्रकार वह मित्र को सुरा का भाग देता है। इस प्रकार जो इस रहस्य को सम- झता है वह अपने मित्र को उसमें स्थान देता है। (४) ९—अब उदुम्बर शाखा की ओर देखते-देखते उतरता है। उदुम्बर ऊर्ज और अन्नाद्य है। इस प्रकार राजा इनको धारण करता है, ऊपर बैठकर और नीचे दोनों पैर करके अपने उतरने को घोषित करता है :- "प्रतिष्ठामि द्यावापृथिव्योः प्रतिष्ठामि प्राणापानयोः प्रति- तिष्ठाम्यहोरात्रयोः प्रतिष्ठाम्यन्नपानयोः प्रति ब्रह्मन् प्रतिक्षत्रे प्रत्येषु त्रिषु लोकेषु तिष्ठामि"।