ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context४७० [ आठवीं पञ्चिका और इन सूक्तों को पढ़कर रथ की ओर देखे :— अप्रतिरथ सूक्त (ऋ० १०।१०३) आशुःशिशानो…… शांस सूक्त (ऋ० १०।१५२) शास इत्था…… सौपर्ण सूक्त (प्र धारायन्तु मधुनः) जब युद्ध में जाते समय कहता है, “तथा मे कुरु यथाहमिमं संग्रामं संजयानि”, “मेरे लिये ऐसा कर कि मैं युद्ध में जीत जाऊँ ।” तो वह अवश्य जीत जायगा अब वह उत्तर पूर्व की दिशा में लड़ेगा और जीत जायगा । अगर अपने देश से निकाल दिया गया हो और लड़ाई पर जा रहा हो तो ऐसा कहे, “ऐसा कर कि मैं अपने राष्ट्र को लौट आऊँ ।” अब वह उसको उत्तर-पूर्व की दिशा में जाने देता है और इस प्रकार राजा अपने देश को लौटता है । उत्तर-पूर्व की ओर खड़ा होकर वह महल को लौटता है और नीचे का मंत्र पढ़ता है मानों वह शत्रु को हरा चुका :— अप प्राच इन्द्र……(ऋ० १०।१३१।१) ऐसा करने से वह शत्रु रहित हो जाता है और उत्तरोत्तर श्री को प्राप्त होता है । जो इस मंत्र को पढ़ता हुआ महल को लौटता है वह प्रजाओं के ऐश्वर्य और आधिपत्य को प्राप्त होता है । महल में आकर घर की अग्नि के पास बैठता है । तब ऋत्विज चार प्याले घी के भरता है । और इन्द्र के लिये तीन आहुतियाँ देता है और प्रपद रीति से मंत्र पढ़ता है । जिससे वह रोग, हानि आदि से सुरक्षित रहे, और अभय को प्राप्त हो । (६)