ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextदूसरा अध्याय ] ४७१ ११—यह तीन मंत्र यह हैं :— पर्य॑षु प्र धन्व॒ वाज॑सातये परि वृत्रा (भूर्ब्रह्म प्राणममृतं प्रपद्यतेऽ यमसौ शर्म॑ वर्मभयं स्वस्तये, सह प्रजया सह पशुभिः) षि स क्षिः द्विषस्तरध्या ऋणया न ईयसे (स्वाहा) । (ऋ० ६।११०।१) अनु॒ हि त्वा सु॒तं सोम॒मदामसि म॒हे सम (भुवो ब्रह्म प्राणममृतं प्रपद्यतेऽयमसौ शर्म वर्मभयं स्वस्तये । सह प्रजया सह पशुभिर् य राज्ञे वाजां अभि पवमान प्रगाहसे (स्वाहा)···(ऋ० ६।११०।२) अजीजनो॒ हि पव॑मान॒ सूर्य्ये वि॒धारे श (स्वर्ब्रह्म प्राणममृतं प्रपद्यते ऽयमसौ शर्म वर्मभयं स्वस्तये । सह प्रजया सहपशुभिः ) क्मना॒ पयः । गोज॑रीया रंह॑माणाः पुर॒न्ध्या (स्वाहा)···(ऋ० ६।११०।३) जिस राजा के लिये ऋत्विज इन इन्द्र के तीन मंत्रों से जो प्रपद रीति से पढ़े गये हैं चार चार चमसों की तीन आहुतियाँ देता है तो वह अपनी सब अरिष्ट बातों पर विजय पाता है । शत्रुओं से छूट जाता है, त्रयी विद्या के द्वारा सुरक्षित रहता है, सब दिशाओं में विचरता है और इन्द्र लोक में प्रतिष्ठा पाता है । अब वह सन्तान, गायों, घोड़ों और पुरुषों के लिये प्रार्थना करता है :--- “इह गावः प्रजयाध्व मिहाश्वा इह पुरुषाः, इहो सहस्र दक्षिणा वीरत्राता निषीदतु ।” हे गायो, तुम यहाँ उत्पन्न हो; हे घोड़ो, यहाँ उत्पन्न हो; हे पुरुष, यहाँ उत्पन्न हो; यहाँ बहुत बड़ा वीर और जाता (मेरा
- जितना भाग कोष्ठ में बन्द है वे वेद मन्त्र नहीं है किन्तु वेद मन्त्र में बीच में पैवन्द लगाया गया है। यही प्रपद रीति कहलाती है।