ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextतीसरा अध्याय १२—अब इन्द्र के महाभिषेक का वर्णन किया जाता है। प्रजापति के सहित देवों ने कहा, 'यह ( इन्द्र ) देवों में सब से अधिक ओजवाला, साहसी, सत्तम अर्थात् सत्त वाला और कामों को सबसे अच्छी भाँति करने वाला है। इसी का अभिषेक करें ( अर्थात् इसी को राजा बनावें ) ।" उन सब ने इन्द्र का महा- भिषेक करना स्वीकार कर लिया। वे उसके लिये ऋचाओं से बने हुये सिंहासन को लाये। उन्होंने बृहत् और रथंतर सामों को सिंहासन के अगले दो पाये बनाया और वैरूप और वैराज को पिछले दो पाये। शक्वर और रैवत को ऊपर का पट्टा, नौधस और कालेय को उसके बगल के तख्ते। ऋचाओं का उन्होंने ताना बनाया, सामों का बाना और यजुषों का बीच का भाग, यश को बिछौना, श्री को तकिया, सविता और बृहस्पति ने उसके अगले पाये पकड़े, वायु और पूषा ने पिछले, ( ४७३ )