BharatKosha
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

Page 499 of 592

Read in context
Page 499

चौथा अध्याय ] ४८५ भरतस्यैष दौष्यंतेरग्निः साचिगुणे चितः । यस्मिन्सहस्रं ब्राह्मणा बद्धशो गात्रि मेजिरे ॥२॥ अष्टासप्ततिं भरतो दौष्यंतिर्यमुना मनुः । गंगायां वृत्रघ्ने बदनात्पंचपंचाशतं हयान् ॥३॥ त्रयस्त्रिंशच्छतं राजाऽश्वान् अबधाय मेध्यान् । दौष्यंतिरत्यगाद्राज्ञो मायां मायावत्तरः ॥४॥ महाकर्म भरतस्य न पूर्वे नापरे जनाः । दिवं मर्त्य इव हस्ताभ्यां नोदापुः पंच मानवाः ॥५॥ अर्थ—भरत ने मष्णर देश में १०७ काले और सफ़ेद दांतों वाले, सोने से आभूषित हाथी दिये ॥१॥ जब दुष्यंत के पुत्र भरत ने साचीगुण नामी नगर में अग्नि स्थापित की तो हज़ारों गायों के गल्ले ब्राह्मणों को दान किये ॥२॥ दुष्यन्त के बेटे भरत ने ७८ घोड़े यमुना के किनारे और ५५ गंगा के किनारे इन्द्र के लिये बाँधे ॥३॥ दुष्यन्त के बेटे । राजा भरत ने ३३०० मेध्य घोड़ों को बांधा और अपनी प्रवल माया के द्वारा माया वाले शत्रु को पराजित कर दिया ॥४॥ जैसे पाँच प्रकार के आदमियों में से कोई भी अपने हाथों से आकाश नहीं छू सकता इसी प्रकार भरत के महाकर्म को न कोई पा सका, न पा सकेगा ॥५॥ इसी इन्द्र के महाभिषेक का उपदेश बृहदुक्थ ऋषि ने दुर्मुख पांचाल को किया । इसी से दुर्मुख ने राजा बन कर पृथ्वी भर का पर्यटन किया और उसको जीत लिया । वसिष्ठ गोत्री सत्यहव्य के पुत्र ने जानंतपि के लड़के अत्य- राति को इसका उपदेश किया । इससे अत्यराति ने इस विद्या