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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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५६ [प्रथम पञ्चिका ऋतस्य गोपा न दभाय सुक्रतु स्त्री ष पवित्रा हृद्यन्तरादधे । विद्वांस विश्वा भुवनाभि पश्यत्यवाजुष्टान् विध्यति कर्ते अव्रतान् ॥८॥ ऋतस्य तन्तुर्विततः पवित्र आ जिह्वाया अग्रे वरुणस्य मायया । धीराश्चित्तत् समिनक्षन्त आशताऽत्रा कर्तमव पदात्यप्रभुः ॥६॥ (ऋ० ९।७३।१-६) प्राण नौ हैं। इन नौ ऋचाओं से वह (प्रवर्ग्य में) प्राण स्थापित करता है। अब वह कहता है :— अयं वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने । इममपां सङ्गमे सूर्यस्य शिशुं न विप्रा मतिभी रिहन्ति ॥ (ऋ० १०।१२३।१) ( इस मन्त्र को पढ़ते हुये जब 'अयं' का उच्चारण करता है तब होता अपनी नाभि की ओर संकेत करता है)। 'अयं' नाभि के लिये आया है। क्योंकि कुछ प्राण नाभि के ऊपर "वेनंति" अर्थात् चलते हैं और कुछ नीचे। इसलिये 'वेन' का अर्थ है नाभि। क्योंकि प्राण नाभि से चलते हैं। 'नाभि' का नाभित्व यही है। इस मन्त्र का उच्चारण करके 'होता' 'प्रवर्ग्य' में प्राण-प्रतिष्ठा करता है। अब वह कहता है :— पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः । अतप्त तनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इदद्वहन्तस्तत् समाशत ॥ (ऋ० ९।८३।१) ꕤवियत् पवित्रंधिषणा अतन्वत··· इन मन्त्रों में 'पवित्र' शब्द आया है। इसलिये प्राण पवित्र होते हैं। यह निचले अंग के प्राण हैं। इसलिये इन तीन मन्त्रों को पढ़ कर वह प्रवर्ग्य में वीर्य, मूत्र और पुरीष धारण कराता है। (३)

  • ꕤपता नहीं कि यह कहां का मंत्र है। देखो आश्व० श्रौ० ४।६।३ ।