ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextचौथा अध्याय ] ५७. २१—अब वह नीचे के मन्त्र को बोलता है :— गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्। ज्येष्ठ- राजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ॥ (ऋ० २।२३।१) इस मन्त्र का देवता ब्राह्मणस्पति है। ब्रह्म ही बृहस्पति है। ब्रह्म के ही द्वारा उसकी चिकित्सा करता है। नीचे के तीन मन्त्र घर्मतनु हैं :— प्रथश्च यस्य सप्रथश्च नामानुष्टुभस्य हविषो हविर्यत् । धातुद्युँतानात् सवितुश्च विष्णो रथन्तरमा जभारा वसिष्ठः ॥१॥ अविन्दन्ते अतिहितं यदासीद् यज्ञस्य धाम परमं गुहा यत् । धातु- द्युँतानात् सवितुश्च विष्णोर्भरद्वाजो बृहदा चक्रे अग्नेः ॥२॥ तेऽविन्दन् मनसा दीध्याना यज्ञं स्कन्नं प्रथमं देवयानम् । धातु- द्युँतानात् सवितुश्च विष्णोरा सूर्यादभरन् घर्ममेते ॥३॥ (ऋ० १०।१८१।१-३) इनको पढ़कर होता प्रवर्ग्य को शरीर और रूप युक्त कर देता है। पहले मंत्र के चौथे पाद में है "रथन्तरमा जभारा वसिष्ठः" अर्थात् 'वशिष्ठ रथन्तर साम को लाया' और दूसरे मंत्र के चौथे पाद में है:—"भरद्वाजो बृहदाचक्रे अग्नेः" अर्थात् "भरद्वाज ने अग्नि से बृहत् साम बनाया"। इन मंत्रों को पढ़ कर होता प्रवर्ग्य को रथन्तर साम और बृहत् साम से युक्त कर देता है। नीचे के तीन को पढ़ कर जिनका ऋषि प्रजावान् प्राजापत्य है, वह प्रवर्ग्य को सन्तान-युक्त कर देता है :— अपश्यं त्वा मनसा चेकितानं तपसो जातं तपसो विभूतम् । इह प्रजामिह रयिं रराणः प्रजायस्व प्रजया पुत्रकाम ॥१॥ अपश्यं त्वा मनसा दीध्यानां स्वायां तनूऋत्व्ये नाधमानाम् । उप मामुच्चा युवतिर्बभूयाः प्रजायस्व प्रजया पुत्रकामे ॥२॥