ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context७४ [ प्रथम पञ्चिका २८—(अग्नि प्रणयन* कृत्य का वर्णन आगे है)। अध्वर्यु होता को आदेश करता है कि (जब अग्नि को उत्तरवेदी में ले जाना हो तो) अग्नि प्रणयन के उचित मंत्र बोलो। (वह पढ़ता है :—) 'प्रदेवं देव्या धिया भरता जातवेदसम् । हव्या नो वक्षदानुषक् ॥ (ऋ० १०।१७६।२) ब्राह्मण हो तो गायत्री छन्द बोले क्योंकि ब्राह्मण गायत्री वाला है। गायत्री तेजयुक्त और ब्रह्मवर्चस्-युक्त है। इस प्रकार यह यजमान को तेजस्वी और ब्रह्मवर्चस्वी करता है। यदि क्षत्रिय हो तो त्रिष्टुप् † छन्द में यह मन्त्र बोले :— इमं महे विदथ्याय शूषं शश्वत् कृत्व ईड्याय प्रजभ्रुः । शृणोतु नो दम्येभिरनीकैः शृणोत्वग्निर्दिव्यैरजस्रः ॥ (ऋ० ३।५४।१) त्रिष्टुभ् वाला क्षत्रिय है। त्रिष्टुभ् ओज, इन्द्रिय-बल और पराक्रम युक्त है। इस प्रकार वह यजमान को ओज, इन्द्रिय-बल और पराक्रम-युक्त कर देता है। इस मन्त्र में जो कहा "शश्वत् कृत्व ईड्याय प्रजभ्रुः (अर्थात् सदा पूजनीय के लिये लाये) इससे होता यजमान को उसके सम्बन्धियों के ऊपर श्रेष्ठ बनाता है। यह जो कहा :— शृणोतु नो दम्येभिरनीकैः शृणोत्वग्निर्दिव्यैरजस्रः । (अग्नि हमारी बात को तेज चिंगारियों से सुने। अग्नि निरन्तर हमको दिव्य प्रकाश के द्वारा सुने।) इससे ऐसा ही
- 'अग्नि-प्रणयन' का अर्थ है अग्नि को ले जाना। यह कृत्य तब होता है जब अग्नि को उत्तरवेदी में ले जाते हैं। † इस मंत्र का छन्द 'पंक्ति' है। ऋग्वेद में भी इसका "निचृत्- पंक्ति" ही छन्द दिया हुआ है। न जाने यहाँ त्रिष्टुम् क्यों दिया ?