ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextपाँचवाँ अध्याय ] ७५ होता है। अग्नि बुढ़ापे तक निरन्तर उसके घर में रहती है। यदि वैश्य हो तो नीचे का जगती ❊ छन्द वाला मन्त्र बोले :- अय॑मि॒ह प्र॑थ॒मो धा॑यि धा॒तृभि॒र्होता॒ यजि॑ष्ठो अध्व॒रेष्वीड्य॑: । यमप्न॑वानो॒ भृग॑वो विरुरुचुर्वने॑षु चि॒त्रं वि॒भवं॑ वि॒शे वि॑शे ॥ ( ऋ० ४।७।१ ) वैश्य जगती वाला है। पशु जगती वाले हैं। इस प्रकार वह यजमान को पशु-युक्त कर देता है। चौथे पाद में “वनेषु चित्रं विभवं विशे विशे” में विश शब्द वैश्य के अर्थ में आया है। इससे इसमें रूप समृद्धता है। जो रूप समृद्ध है वही यज्ञ में सफलता देता है। अयमुष्य प्र देवयुर्होता यज्ञाय नीयते। रथो न योरभीशुतो घृणी- ञ्चेतति त्मना ॥ ( ऋ० १०।१७६.३ ) इस अनुष्टुभ् वाले मंत्र से वाणी को छोड़ता है ( अर्थात जोर से बोलता है )। अनुष्टुभ् वाणी है। अनुष्टुभ् छन्द बोल कर वह वाणी को वाणी में छोड़ता है। ‘अयमुष्य’ से यह तात्पर्य है कि “मैं जो पहले गन्धर्वों के साथ थी अब वापिस आ गई।” अयमग्निरुरुष्यत्यमृतादिव जन्मनः। सहसश्चित् सहीयान् देवो जीवात्वे कृतः ॥ ( ऋ० १०।१७६।४ ) ( यह अग्नि अपनी अमृत प्रकृति से हमको निडर बनाती है ) इस मंत्र को पढ़ कर वह यजमान को अमर बनाता है। दूसरे पाद “सहसश्चित् सहीयान् देवो जीवात्वे कृतः” ( देवता हमारे जीवन के लिये अपनी शक्ति द्वारा शक्तिशाली बनाया गया ) से यह तात्पर्य है कि मंत्र को पढ़ कर अग्नि को अपने जीवन का रक्षक बनाता है। ❊ यह वेद में त्रिष्टुभ् दिया हुआ है।