BharatKosha
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

Page 98 of 592

Read in context
Page 98

८४ [ प्रथम पञ्चिका ( उस मरुतों के राजा विष्णु की बुद्धि का वरुण और दोनों अश्विन अनुकरण करते हैं। विष्णु अपने मित्रों सहित अन्धकार के स्थान को खोल कर दिन को उत्पन्न करता है।) विष्णु देवों का द्वारपाल है। इस लिये वह सोम के लिये द्वार खोल देता है । जब सोम को सदस् में रखने के निकट होते हैं तो यह मंत्र पढ़ता है :— अन्तश्च प्रागा अदितिर्भवास्यवयाता हरसो दैव्यस्य । इन्द विन्द्रस्य सख्यं जुषाणः श्रोधीव धुरमनुराय ऋध्याः । ( ऋ० ८।४८।२ ) जब सोम बैठ गया हो तो यह मंत्र पढ़ते हैं :— श्येनो न योनि सदनं धिया कृतं हिरण्ययमसदं देव एषति । प- रिखन्ति बर्हिषि प्रियं गिराश्वो न देवां अप्येति यज्ञियः । ( ऋ० ६।७१।६ ) जैसे बाज पक्षी अच्छी तरह बनाये हुये घोंसले में बैठता है वैसे ही सोम देवता स्वर्ण के आसन पर बैठता है। आसनों पर प्यारी स्तुतियां चलती हैं और यज्ञ सम्बन्धी घोड़े के समान वह देवताओं तक पहुँचता है । स्वर्ण के आसन से काले मृगचर्म का तात्पर्य है जिससे देवों का हवि ढका जाता है । वरुण के इस मंत्र से समाप्त करता है :— अस्तभ्नाद् द्यामसुरो विश्ववेदा अमिमीत वरिमाणं पृथिव्याः । आसीदद् विश्वा भुवनानि सम्राड् विश्वेत्तानि वरुणस्य व्रतानि । ( ऋ० ८।४२।१ ) ( असुर अर्थात् प्राणों के रक्षक देव ने द्यौ को थामा और पृथिवी के विस्तार को नापा । उस सम्राट् ने सब लोकों में प्रवेश किया। यह सब वरुण के व्रत हैं )