ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextपाँचवाँ अध्याय ] ८५ सोम जब तक बंधा हुआ है तब तक वरुण के अधीन है । यह जब तक चल रहा है। इसको इसी के देवता और इसी के छन्द से समृद्ध करते हैं । यदि कोई यजमान का आश्रय चाहे या उसकी रक्षा का मांगने वाला हो तो होता इस मंत्र से समाप्त करे :- एवा वन्दस्व वरुणं बृहन्त नमस्या धीरममृतस्य गोपाम् । स नः शर्म त्रिवरूथं वि यंसत् पातं नो द्यावा पृथिवी उपस्थे । ( ऋ० ८।४२।२ ) जो इस रहस्य को समझ कर इस मंत्र से समाप्त करता है वह जितने लोगों के लिये चाहता है उनके लिये अभय प्राप्त कराता है । जो इस रहस्य को समझता है उसे इसी मंत्र से समाप्त करना चाहिये । यह सब १७ मंत्र जो बोले गये रूप समृद्ध हैं । जो मंत्र रूप समृद्ध होते हैं अर्थात् जिनमें उसी कृत्य का वर्णन होता है जो किया जाता है उससे यज्ञ में सफलता होती है। इन १७ में से पहले और पिछले को तीन-तीन वार पढ़ा । इस प्रकार २१ हो गये । प्रजापति २१ अंक वाला है । क्योंकि प्रजापति में १२ मास, पांच ऋतुयें, तीन लोक और सूर्य शामिल हैं । सूर्य का स्थान सब से ऊंचा है । वह देवों का क्षत्र है, वह श्री है, वह आधिपत्य है, वह चमकने वाले का स्वर्ग है, वह प्रजापति का घर है । वह स्वाराज्य है । होता यजमान को इन १७ मंत्रों से समृद्ध कर देता है ।