अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextअकबर बीरबल विनोद १६७ था अतएव उसे अपने यहाँ बुलवाने का निश्चय किया। दूसरे दिन दीवानखाना खूब सजाया गया। उस कमरे में भारतवर्ष की एक से एक सजावट की वस्तुएँ अपने २ करीने से सजाकर रख दी गईं। दरबारियों के बैठने के लिये आसन भी खूब सजाकर लगाया गया। जब इस प्रकार से बादशाह ने अपने यहाँ तय्यारी कर ली तो एक चपरासी द्वारा उस नवागत बारांगणा को बुलावा भेजा। वह भला कब नहीं करने वाली थी यह तो उसकी मनचाही बात थी। उसने बादशाह के दरबार में जाना सहर्ष स्वीकार किया। फिर सायंकाल में खूब सार श्रृङ्गार कर अपने सफरदाइयों को लिये हुये दरबार में दाखिल हुई। उसकी लुनाई से दिल्ली दर्बार रौशन हो गया। बादशाह ने चपरासी भेजकर अपने सब दरबारियों को बुलवाया। वे बादशाह का निमंत्रण पाकर नवीन वेश्या का नृत्य देखने की इच्छा से आये। यह नायका अपने रूप लावण्य और कला कौशल से कितनों को मोहित कर चुकी थी, फिर बादशाह क्यों न मुग्ध होता-“उसने बड़ी निपुणता से लगातार छः सात घण्टों तक नृत्य गान किया। सभी लोग उसकी तारीफ करने लगे। बादशाह ने भी मुक्तकंठ से प्रसंशा की। बादशाह ने अपने मन में अनुमान किया कि यह द्रव्योपार्जन के निमित्त यहाँ आई है इसलिये इसको द्रव्या- भूषण देकर संतुष्ट करना चाहिये। बादशाह दीवान से राय मिलाकर उसके लिये बहुत सी अशर्फियाँ और सुन्दर २ वस्त्र देने के लिये मँगवाया। वह उनको देखकर विनम्रता से बोली-“पृथ्वीनाथ ! मैं यह नृत्य गान आपको गुणग्राही