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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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१६८ अकबर बीरबल विनोद समझकर किया है, मुझे अपना मन प्रसन्न करना अभीष्ठ था, इनाम की चाहना नहीं है।" बादशाहने मनमें सोचा-"शायद इतने पारितोषिकको न्यून समझकर यह संतुष्ट नहीं हुई है अतएव इसे कुछ और धन पाने की लिप्सा है। वह उस वेश्या से बोला-"यदि तुझे और कुछ माँगने की इच्छा हो तो उसे भी माँग सकती हो?" वेश्या ने कहा-"पृथ्वीनाथ ! मुझे केवल एक वस्तु माँगने की इच्छा है, परन्तु आप पहले बचनबद्ध हों तो माँगू।" बाद- शाह कुछ सोंच विचार के बाद बोला-"मेरी घर की निजी वस्तुओं के अतिरिक्त जो कुछ माँगोगी तुझे दिया जायगा। मैं अपनी बात एक बार कहकर फिर लौटाता नहीं हूँ।" वह कुछ देर खामोश रहकर फिर बोलो-"गरीबपरवर ! मैं आपके गद्दी पर पाखाना फिरने की इच्छा रखती हूँ।" उस वेश्या की इस ढिठाई पर सब दरबारी सन्न हो गये। उसने खुल्लमखुल्ला बादशाह का अपमान किया था। बादशाह भीतर २ बड़ा क्रोधित हुआ, परन्तु चूँकि बचनबद्ध हो चुका था इसलिये प्रगट रूप से खामोश रहा। सबको बड़ा सोच हुआ। किसी की अकल काम नहीं करती थी। आखिर बीरबल से राय मिलाई गई। बीरबल ने बादशाह को ढाढ़स दिलाया। वह वेश्या लोगों को फुस-फुस करते देखकर बड़ी प्रसन्न हुई और उसके चेहरे पर हठात् हँसी आने लगी। बीरबल बोला-"इसको बचन दिया जा चुका है इसलिये उसका पालन किया जायगा।" वेश्या बोली-"मैंने पहले ही आपसे आज्ञा प्राप्त करली है तब माँगा है। यदि नहीं

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