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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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१७४ अकबर बीरबल विनोद और पैरों में बेड़ियाँ जकड़ने की आज्ञा दी। वह बोला- "ये महामूर्ख हैं, केवल नकल करना जानते हैं। बीरबल ने जो कढ़ी का नाम लिया था उसका तात्पर्य दूसरा ही था। बादशाह के क्रोध के सामने सबका छक्का छूट गया और सबों ने एक साथ करबद्ध प्रार्थना कर अपने अपराधों की माफी माँगी। —:*:— माला दे ? एक दिन बीरबल को जमुना नहाने की इच्छा जागृत हुई इसलिये वह तड़के उठकर जमुना जी नहाने गया। स्ना- नोपरान्त एक जगह आसन बिछाकर रुद्राक्ष की माला जपने लगा। उसी समय हवा खोरी से लौटकर घूमता २ घोड़े पर सवार बादशाह भी वहीं जा पहुँचा। वह घोड़े से उतर पड़ा और बीरबल से बोला- "बीरबल ! मुझे मा ला दे।" बीरबल बड़ा लाल बुझकड़ था, वह तुरत ताड़ गया कि बादशाह दुअर्थी कहकर मजाक कर रहे हैं। वह मुँह से तो कुछ न बोला परन्तु उसी समय अपना दुपट्टा नदी के जल में छोड़ दिया-बादशाह यह देखकर फिर बोला- "बीरबल ! देखो दुपट्टा बहता है।" अब बीरबल को औसर मिला वह तुरत बोल उठा-"पृथिवीनाथ ! बहने दो।" बादशाह बीरबल के दुअर्थक उत्तर को समझ कर बड़ा नाराज हुआ और भृकुटी बदलकर बीरबल से पूछा- "क्यों बीर- बल ! तू हँसी हँसी में मेरी बहन माँग रहा है?" बीरबल बोला- "पृथिवीनाथ ! आप भी तो हमारी माँ माँगते हैं।" बादशाह

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