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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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अकबरबीरबल विनोद १७५ जरा नरमा कर फिर बोला- "मैंने तेरी माँ कब माँगी है, क्या मैंने किसी का नाम लिया था ?" बीरबल ने कहा- "गरीबपरवर ! मैंने आपके बहन का नाम कब लिया था और कब उसे माँगा था । मैंने तो आपसे केवल दुपट्टा बहने देने की अर्ज करी थी । आपकी बहन मेरे बहन के समान है। मैं उसका नाम अपनी जबान पर कैसे ला सकता हूँ।" बादशाह को आगे बढ़ने का कोई मार्ग नहीं मिला अतएव खामोश रह गया ।

भाग्य बड़ी है कि उद्योग एक दिन बादशाह ने अपने दरबारियों से भरी सभा में पूछा- "भाग्य बड़ी है कि उद्योग।" सब दरबारियों ने एक मत होकर बतलाया- "पृथिवीनाथ ! उद्योग बड़ा है ?" परन्तु बीरबल की राय सबसे भिन्न थी। वह अपनी तरफ से अकेला होकर बोला- "महाराज ! मेरी सम्मति से भाग्य बड़ी है।" बादशाह ने बीरबल से पूछा- "यदि उद्योग न किया जाय तो भाग्य क्या कर सकती है, भला उस मनुष्य को जो भाग्य के भरोसे बैठ रहे, कभी खाना नसीब हो सकता है ?" बीरबल ने उत्तर दिया- "चाहे कोई कितना ही उद्योग क्यों न करे, परन्तु जो बात उसके भाग्य में लिखी न होगी, कदापि नहीं मिल सकती। यह सब देखते हुए भाग्य को ही प्रधानता मिलनी चाहिये ।" एक दरबारी को बीरबल की यह दलील बहुत खटकी