अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in context१७६ अकबर बीरबल विनोद और मुझ क्षुधित का आशीर्वाद ले ।” बीरबल बड़ी असमंजस में पड़ गया एक तो मरण काल दूसरे फकीर की याचना सो भी मछली । वह बोला—“शाह साहब ! आपको ज्ञात होना चाहिये कि मैं एक कुलीन ब्राह्मण हूँ; हमलोग अपने चौके में मछली माँस का प्रयोग नहीं करते फिर आपको क्योंकर खिलाऊँ ।” फकीर बोला-“यह सब सही है, परन्तु यदि तू इस मरणकाल में मेरी क्षुधा मिटायेगा तो इस पुण्य से तेरा बालबच्चों के सहित कल्याण होगा । वहाँ पर उस समय जितने लोग एकत्रित थे सभी ने बीरबल से फकीर की इच्छा पूर्ति का अनुरोध किया । कुछ काल तो योंही बात चीत में टल गया अन्त में मत विशेषता के कारण बीरबल को अपनी जिद्द छोड़नी पड़ी । एक आदमी बाजार जाकर एक मल्लाह से एक खूब मोटी और बड़ी मछली खरीद लाया । जब उस मछली को बीरबल छूड़ी लेकर चीरने बैठा तो उसके पेट में कोई ठोस चीज दिखाई पड़ी, उसका संपूर्ण पेट काटते ही बादशाह की वह जलमें फेकी हुई अँगूठी बाहर निकल आई । बादशाह अपनी खिरकी से गरदन निकाल कर बीरबल की फाँसी का दृश्य देख रहा था । उसने देखा कि बीरबल एक मछली फाड़ रहा है, परन्तु उसके और उस फकीर के अन्तर्गत क्या क्या बातें हुईं इसका उसे कुछ भी गम न था । बीरबल उस अँगूठी को हाथ में लेकर खड़ा हो गया और शाह साहब को देखने लगा । वे उसके खड़ा होने से पहले ही अन्तर्ध्यान हो गये थे ।