अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextअकबर बीरबल विनोद १८० बीरबल ने एकत्रित मंडली से कहा-“आप लोगों की अनुमति प्राप्त कर मैं एक बार पुनः बादशाह से मिलना चाहता हूँ, कृपाकर मुझे फिर बादशाह के समीप ले चलें। उन लोगों ने मछली का पेट फाड़ते समय कुछ निकलते हुये अवश्य देखा था पर क्या निकला सो कोई नहीं जानता था। वे बड़ी प्रसन्नता से कर्मचारियों के सहारे बीरबल को बादशाह के पास ले गये। बीरबल को अपने समीप आते हुये देखकर बादशाह ने अनुमान किया-“हो न हो बीरबल डरकर अब उद्योग की प्रधानता स्वीकार करने के लिये मेरे पास आ रहा हो परन्तु अब मैं अपनी आज्ञा भंग न करूँगा। इसी लिये इसके पहले ही मैंने उसे कई बार मौका दिया था, परन्तु उस समय उसने मेरी बातों पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया।” बीरबल पास पहुँचकर बादशाह को सलाम किया। तब बादशाहने कहा-“बीरबल ! अब तुम्हारा प्रयास करना वृथा है, इस समय चाहे तुम उद्योग की प्रधानता मान भी लो परन्तु मैं अपनी आज्ञा रद्द नहीं करूँगा। बीरबलने कहा-“प्रभु ! जरा पहले मेरी बातें सुन लें; मैं उद्योग की प्रधानता मानने नहीं आया हूँ।” बादशाह ने कहा-“अच्छा कहो।” तब बीरबल बोला-“आपकी अँगूठी देने आया हूँ इसे पहन लीजिये।” बादशाह ने उसे हाथ में लेकर देखा तो सचमुच वही राज मुहर वाली अँगूठी थी। उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि वे उसे जमुना के अगाध जल में फेंक आये थे। कई बार खूब उलट पलट कर देखा जब उसके निस्वत कुछ