BharatKosha
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

Page 195 of 292

Read in context
Page 195

१८१ अकबर बीरबल विनोद सन्देह न रहा तो बोले-“बीरबल यह अँगूठी कैसे प्राप्त हुई?” बीरबल ने जवाब दिया-“गरीबपरवर ! मेरा प्रारब्ध घसीट लाया है। तब उसके मिलने का सब किस्सा बीरबलने बादशाह को सुनाया। बादशाह बीरबल से बहुत प्रसन्न हुए और दस हजार मुहरें, एक सुन्दर वस्त्र तथा कई बाहन पुरस्कार में दिये। उसके घर वालों को भी सुन्दर २ वस्त्र दिये गये। उप- स्थित जनता के सहित बादशाह ने प्रसन्नता से प्रारब्ध की प्रबलता स्वीकार कर ली। ─━o:*:o━─ बादशाह और कवि गंग एक दिन बादशाह जनाने महल में गाना सुन रहे थे, उसके कुटुम्ब की सारी स्त्रियाँ उपस्थित थीं। वहाँ पर सिवा बादशाह के दूसरा कोई मर्द नहीं था। यह जुमावड़ा बादशाह की बेगमों के मत से हुआ था। उनका विचार था कि बादशाह प्रेम में फाँसकर कुछ दिनों तक महल में रक्खे जायें। उनका उद्योग भी कुछ २ सफल होते दिखलाई पड़ा, बादशाह उनके प्रेम में फँस गये। एक बेगम जिसका कोकिल कंठा नाम था, सब के अन्त में एक वियोग मिश्रित गजल गाना शुरू किया। उसकी ऐसी दीनता भरी गजल से बादशाह पिघल गये और उससे पूछे “इस गाने से तुम्हारा क्या तात्पर्य है ?” बेगम ने कहा- “प्रभु आपका अधिकतर समय लड़ाई ही में बीतता है और यहाँ हम घर में पड़ी २ आपके वियोग की एक एक

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · Page 195 of 292 · BharatKosha