अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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दीख पड़ता है। तदर्थ उसने गुप्त द्वार का ही आश्रय लिया। रात्रि का चतुर्थ पहर था-लुकते छिपते वह एक ऐसी जगह जा पहुँचा जहाँ से हल्का प्रकाश बाहर को आ रहा था। बादशाह पाखाने से निवृत्त होकर दातून कर रहा था, उसके चारों तरफ बारांगनाओं की चौकी थी। बादशाह का आनन्द उपभोग देखकर गंग चकरा गया। और मन ही मन सोचा-"भला ऐसा कौन त्यागी होगा जो ऐसा इन्द्रभवन का उपभोग त्यागकर दुनिया के बखेडों में फँसकर जीवन व्यतीत करेगा। किसीके आनन्द में बाधा पहुँचाने से बड़ा प्राश्चित लगता है, परन्तु क्या करूँ मैं तो कतंव्य की बेड़ी पहन चुका हूँ, मुझे तो उसका निर्वाह करना ही पड़ेगा। फलदाता ईश्वर है उसे जो पसन्द होगा करेगा। ऐसा संकल्प विकल्प कर अपने मनको भली-भाँति पक्का कर लिया फिर खिड़की के समीप पहुँच कर एक गहरी लल- कार देकर बोला-"ऐ बादशाह ! तू अभी तक अपने को मनुष्य समझकर अचेत पड़ा है; परन्तु बाहर के लोग तुझे घोड़े और गदहे की उपाधि वितरण कर रहे हैं, क्या तुझे इसका भी कभी ध्यान आता है, मौका है अब भी सँभल जा।" इतना कहना था कि वह बड़ी तेजी से निकल भागा, उसके भागने की गति इतनी तेज थी कि चाहे कोई कितना ही दौड़ाक क्यों न होता परन्तु उसका हाथ नहींमार सकताथा। बादशाह भीतर से पुकार कर बोले-"अरे कोई है, इस नालायक को अभी जान से मार डालो।" बादशाह को गंग ऐसा प्रख्यात कवि का शब्द ज्ञात था उसकी आवाज से उसने गंगका होना